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5 Jun 2026, Fri

उज्जैन की लुप्त होती धरोहर ‘सप्तसागर’

उज्जैन। सात सरोवरों के कायाकल्प से धार्मिक पर्यटन को लगेंगे पंख धार्मिक नगरी उज्जैन, जिसे प्राचीन काल में अवंतिका के नाम से जाना जाता था, केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए ही नहीं बल्कि अपने पवित्र सरोवरों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध रही है। इन्हीं सरोवरों में सबसे महत्वपूर्ण हैं ‘सप्तसागर’ – सात पवित्र जल स्रोत जिनका उल्लेख स्कंद पुराण, अवंतिखंड और अन्य धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। समय की मार और शहरीकरण के कारण ये सरोवर धीरे-धीरे अपनी पहचान खोते जा रहे थे। लेकिन अब जिला प्रशासन, उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड और पुरातत्व विभाग ने मिलकर ‘सप्तसागर पुनरुद्धार परियोजना’ शुरू की है। 2028 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले से पहले इन सातों सरोवरों को उनके प्राचीन स्वरूप में लौटाने का लक्ष्य रखा गया है।

क्या हैं सप्तसागर? पौराणिक मान्यता और महत्व ‘सप्तसागर’ का शाब्दिक अर्थ है सात सागर। मान्यता है कि भगवान शिव ने जब उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया, तब सात ऋषियों के अनुरोध पर सात स्थानों पर दिव्य जल प्रकट किया।

ये सात सरोवर है :- 1. रुद्रसागर: महाकाल मंदिर के पास स्थित यह सबसे प्रसिद्ध सरोवर है। महाकाल लोक कॉरिडोर बनने के बाद इसके एक हिस्से का सौंदर्यीकरण हो चुका है, लेकिन पूरा सरोवर अभी भी गाद और अतिक्रमण से जूझ रहा है। मान्यता है कि इसमें स्नान से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।

2. विष्णु सागर: गोपाल मंदिर के निकट स्थित यह सरोवर भगवान विष्णु को समर्पित है। प्राचीन काल में यहाँ विष्णु मंदिर भी था जिसके अवशेष अब भी मिलते हैं।

3. क्षीर सागर: नाम के अनुसार यह ‘दूध का सागर’ माना जाता है। कहते हैं इसका जल कभी दूध जैसा सफेद था। वर्तमान में यह लगभग सूख चुका है।

4. पुरुषोत्तम सागर: अंकपात क्षेत्र में स्थित यह सरोवर पुरुषोत्तम यानी भगवान विष्णु के नाम पर है। स्थानीय लोग इसे ‘पुरनिया तालाब’ भी कहते हैं।

5. गोवर्धन सागर: भूखी माता मंदिर के पास स्थित इस सरोवर का संबंध भगवान कृष्ण की गोवर्धन लीला से माना जाता है।

6. रत्नाकर सागर: हरसिद्धि मंदिर के पीछे स्थित इस सरोवर के बारे में कहा जाता है कि इसमें स्नान से रत्नों जैसी कांति प्राप्त होती है।

7. पुष्कर सागर: यह सरोवर सबसे अधिक उपेक्षित है। प्रशासन के रिकॉर्ड में भी इसकी सीमाएं स्पष्ट नहीं हैं। स्कंद पुराण के अवंतिखंड में लिखा है – _“सप्तसागर समायुक्ता अवंतिका पुण्यदायिनी”_ यानी सात सागरों से युक्त अवंतिका पुण्य देने वाली है। मान्यता है कि सिंहस्थ के दौरान इन सातों सरोवरों में स्नान करने से सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।*वर्तमान स्थिति: अतिक्रमण और उपेक्षा की मार* पिछले 50 वर्षों में उज्जैन के तेजी से शहरीकरण ने इन सरोवरों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। रुद्रसागर को छोड़कर बाकी 6 सरोवरों की स्थिति बेहद खराब है। पुष्कर सागर और क्षीर सागर लगभग पूरी तरह सूख चुके हैं और इनकी जमीन पर अवैध कॉलोनियां बस गई हैं। गोवर्धन सागर में शहर का गंदा पानी छोड़ा जा रहा है। रत्नाकर सागर पर कचरे का ढेर लगा रहता है। उज्जैन स्मार्ट सिटी के सर्वे के अनुसार, 1960 में सप्तसागर का कुल जलभराव क्षेत्र लगभग 85 हेक्टेयर था, जो अब घटकर केवल 23 हेक्टेयर रह गया है। यानी 70% से ज्यादा क्षेत्र अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुका है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि 1980 तक इन सरोवरों में साल भर पानी रहता था और लोग यहाँ तैराकी भी करते थे।*प्रशासन की कार्ययोजना: 320 करोड़ की परियोजना* उज्जैन कलेक्टर नीरज कुमार सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप ‘सप्तसागर पुनरुद्धार परियोजना’ को स्वीकृति मिल गई है। 320 करोड़ रुपये की इस परियोजना को 3 चरणों में पूरा किया जाएगा।

पहला चरण – दिसंबर 2026 तक: सातों सरोवरों की सीमाओं का निर्धारण, अतिक्रमण हटाना और गाद निकालना। इसके लिए ड्रोन सर्वे और पुराने राजस्व रिकॉर्ड का सहारा लिया जा रहा है। रुद्रसागर और विष्णु सागर से गाद निकालने का काम अगले महीने से शुरू होगा।

दूसरा चरण – जून 2027 तक: सरोवरों में वर्षा जल को लाने के लिए नालों को जोड़ा जाएगा। हर सरोवर के चारों ओर पक्के घाट, परिक्रमा पथ, लाइटिंग और बैठने की व्यवस्था की जाएगी। सरोवरों के किनारे उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं को पत्थरों पर उकेरा जाएगा।

तीसरा चरण – दिसंबर 2027 तक: सभी सात सरोवरों को ‘सप्तसागर परिक्रमा मार्ग’ से जोड़ा जाएगा। यह 14 किलोमीटर लंबा मार्ग होगा जिस पर ई-रिक्शा और पैदल चलकर श्रद्धालु एक दिन में सातों सरोवरों के दर्शन कर सकेंगे। हर सरोवर पर QR कोड लगेंगे जिन्हें स्कैन करने पर उस सरोवर का इतिहास और महत्व हिंदी, अंग्रेजी में सुनाई देगा। सिंहस्थ 2028 से पहले पूरा करने का लक्ष्य सिंहस्थ मेला उज्जैन का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है जिसमें देश-विदेश से 5 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। 2028 के सिंहस्थ में ‘सप्तसागर स्नान’ को नया आकर्षण बनाने की योजना है। महाकाल लोक के बाद यह उज्जैन का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक पर्यटन प्रोजेक्ट होगा। महाकाल मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष ने बताया कि प्राचीन परंपरा के अनुसार सिंहस्थ के दौरान सबसे पहले नागा साधु सप्तसागर में स्नान करते थे, फिर शिप्रा में। इस परंपरा को फिर से जीवित किया जाएगा। इसके लिए अखाड़ा परिषद से भी चर्चा हो चुकी है।*स्थानीय लोगों और संतों की प्रतिक्रिया* अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी आत्मानंद सरस्वती ने कहा, “सप्तसागर उज्जैन की आत्मा हैं। इनके बिना अवंतिका अधूरी है। सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है। हम चाहते हैं कि सरोवरों के आसपास कंक्रीट कम और हरियाली ज्यादा हो।”स्थानीय निवासी और इतिहासकार डॉ. रमेश द्विवेदी कहते हैं, “हमने बचपन में इन सरोवरों में कमल के फूल खिलते देखे हैं। अगर ये फिर से जीवित हो गए तो उज्जैन का भूजल स्तर भी सुधरेगा। यह केवल धार्मिक नहीं, पर्यावरण का भी मामला है।”चुनौतियां भी कम नहीं परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती अतिक्रमण हटाना है। पुष्कर सागर की जमीन पर 300 से ज्यादा मकान बन चुके हैं। प्रशासन ने नोटिस जारी कर दिए हैं लेकिन स्थानीय विरोध की आशंका है। दूसरी चुनौती सरोवरों में साल भर पानी बनाए रखना है। इसके लिए गंभीर डैम से पाइपलाइन डालने का प्रस्ताव है।

निष्कर्ष: लौटेगी अवंतिका की पुरानी पहचान उज्जैन को ‘मंदिरों की नगरी’ के साथ ‘सरोवरों की नगरी’ भी कहा जाता था। सप्तसागर का पुनरुद्धार केवल पत्थर और पानी का खेल नहीं है, बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान को वापस लाने का प्रयास है। यदि यह परियोजना सफल होती है तो महाकाल के दर्शन करने आने वाला श्रद्धालु सप्तसागर की परिक्रमा किए बिना वापस नहीं जाएगा। 2028 का सिंहस्थ उज्जैन के लिए ‘महाकाल लोक’ के बाद ‘सप्तसागर युग’ की शुरुआत साबित हो सकता है।

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