
उज्जैन, 22 मई। कालिदास संस्कृत अकादमी में गतवर्ष की भांति इस वर्ष भी कला शिविर बहुत उत्साह के साथ और उतनी ही गम्भीरता के साथ संचालित हो रहा है।इस शिविर में पिता, पुत्री तथा नाती तीनों प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। एक ओर पिता जहां सुगम संगीत का प्रशिक्षण ले रहे हैं वहीं पुत्री एवं नातिन लोकनृत्य तथा कथक का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इस कलाशिविर में शास्त्रीय कलाओं के साथ साथ लोक कलाओं का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शिविर प्रतिदिन प्रातः 8 से 10 बजे तक संचालित होता है, जिसमें लिखावट सुधारने के लिये कैलीग्राफी का प्रशिक्षण, शास्त्रीय नृत्य की दृष्टि से कथक का प्रशिक्षण, लोकनृत्य में मालवी लोकनृत्य तथा लोकगायन में संत रविदास के भजन, मीराबाई के भजन तथा सुगम संगीत में राष्ट्र अराधना के गीत सिखाएं जा रहे हैं। नाट्य प्रशिक्षण के अंतर्गत संत रविदास पर केन्द्रित एक नाटक का अभ्यास प्रशिक्षणार्थी कर रहे हैं। यह दृष्य है कालिदास संस्कृत अकादमी में संचालित होने वाले ग्रीष्मकालीन शिविर का यहां लोकनृत्य में 18, कैलीग्राफी में 41, शास्त्रीय नृत्य कथक में 40, सुगम संगीत में 16, लोकसंगीत में 29 तथा नाटक में 20 प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।लोकनृत्य प्रशिक्षक श्रीमती हीरामणि वर्मा प्रसिद्ध लोक कलाकार श्रीमती कृष्णा वर्मा के मार्गदर्शन में सीखा रही हैं। आपने कहा कि हम लोकनृत्य के माध्यम से मालवा की संस्कृति भाषा तथा लोकनृत्य प्रशिक्षणार्थियों को सीखा रहे हैं। बारिश की ऋतु में जब मेघ आते हैं तब गांव की महिलाएं पनघट पर एकत्र होती हैं और उस समय के भाव को दर्शाने वाला पनिहारी नृत्य ठेट मालवा में प्रचलित मालवी मटकी ढोल की थाप पर सिखाया जा रहा है।आकाशवाणी से लोकगायन में ‘ए’ ग्रेड कलाकार श्री रामचन्द गांगोलिया ने बताया कि उनके मार्गदर्शन में लगभग 30 प्रशिक्षणार्थी लोकगायन सीख रहे हैं। हमने गुरुग्रन्थ साहेब में संत रविदास के जो पद्य हैं उनको गायन के लिए चुना है। इसमें ‘प्रभुजी शरण तिहारी’, ‘ऐरी मैं तो प्रेम दिवानी’ जो मीरा बाई का प्रसिद्ध पद्य है वो सिखाया जा रहा है, ‘साची प्रित तुम हम संग लागी’ भी इसमें सम्मिलित है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत प्रसिद्ध नृत्यगुरु श्रीमती राजश्री शिर्के मुम्बई से यहां आकर प्रशिक्षण दे रही हैं। आपने बताया कि वे छात्रों को ऋतुसंहार पर आधारित ग्रीष्मऋतु एवं वर्षाऋतु पर नृत्य सीखा रही हैं जिसमें मेघ की गर्जना, नदियों का कल-कल, मोर का नृत्य आदि देखने को मिलेगा। लोकगायन सीख रही श्रीमती जूही शर्मा जो पेशे से शिक्षिका है। उन्होंने बताया कि मैं तो अपनी बच्ची को शिविर में सम्मिलित करवाने आई थी किन्तु यहां आने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं भी सीख सकती हूं तो मैंने भी लोकनृत्य में प्रवेश ले लिया। आपने बताया कि अकादमी में जो एक सकारात्मक ऊर्जा एवं वातावरण का प्रभाव महसूस हुआ तो सीखने की इच्छा जागृत हो गई। श्रीमती नेहा भावसार जो गृहणी है, उन्होंने कहा कि जब पहले कथक सिखती थी तो बीच में नृत्य छूट गया। इस प्रशिक्षण शिविर से पुनः सीखने का अवसर मिल रहा है, यह सोचकर मैंने नृत्य की कक्षा में प्रवेश लिया। श्रीमती नूतन सोलंकी जो पेशे से निजी विद्यालय में शिक्षिका हैं। उन्होंने कहा कि अपनी बेटियों के साथ नृत्य सीख रही हैं। श्रीमती मेघा तिवारी ने कहा कि वे तो अपनी बच्ची को प्रवेश दिलाने के लिए यहां आई तो नृत्य की थाप की आवाज सुनकर बरबस ही मैं नृत्य की ओर आकृष्ट हो गई। अब मैं भी नृत्य सीख रही हूं।कैलीग्राफी का प्रशिक्षण प्रदान कर रही श्रीमती हिमांशी चौबे ने कहा कि कैलीग्राफी के माध्यम से लिखावट को सुन्दर बनाया जाता है। प्राचीन समय में इसे सुलेख भी कहा जाता था। हस्ताक्षर किसी भी व्यक्ति की पहचान होती है और इससे व्यक्तित्व में निखार आता है। यह पढ़ाई नहीं अपितु कला का प्रशिक्षण है। प्रशिक्षण प्राप्त कर रही बालिका ने बताया कि हमने कैलीग्राफी में विभिन प्रकार के फॉट बनाना सीखे तथा किस प्रकार से शब्दों को टेक्चर तथा शेडिंग कर अधिक प्रभारी बनाया जा सकता है जो हम बेसिक नॉर्मल राईटिंग सीखते है उससे कहीं ज्यादा अलग है। सुश्री उपेक्षा गर्ग ने कहा कि साधारण लिखना तो हर किसी को आता है पर लिखावट को अधिक आकर्षक कैसे बनाए इस पर बहुत ही सुक्ष्मता से श्रीमती हिमांशी चौबे द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही हम कहां गलत है और कहां पर सही यह भी बताया जा रहा है। सुश्री इतीश्री उईके ने कहा कि मुझे कैलीग्राफी का प्रशिक्षण लेते हुए मात्र 6 दिवस ही हुए हैं किन्तु मेरी प्रशिक्षण प्राप्त करने से पहले की लिखावट और अभी की लिखावट में बहुत अंतर दिखाई दे रहा है। पहले से मेरी लिखावट सुधरी है तथा सुन्दर भी हो गई है। मैं निरन्तर इसका अभ्यास करती रहूंगी। श्रीमती पूजा अग्रवाल ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि मुझे यहां आकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई है, मैं विगत 20 वर्षों से अकादमी से जुड़ी हुई हूं मैंने जो सीखा है अकादमी के प्रशिक्षण शिविरों में ही सीखा है। मुझे गर्व है कि कालिदास संस्कृत अकादमी मेरे शहर उज्जैन में है। पहले तो मैं मन में संकोच कर रही थी की इतने छोटे बच्चों के बीच में मैं कैलीग्राफी का प्रशिक्षण कैसे प्राप्त करूंगी किन्तु यहां आने के बाद मेरा सारा संकोच दूर हो गया। यहा प्रशिक्षक सभी पर बहुत ही बारिकी से ध्यान दे रहे हैं जो मुझे अत्यन्त प्रभावी लगा। आपकी संस्था कालिदास संस्कृत अकादमी में आप इतनी सारी सुविधाएं और प्रशिक्षण निःशुल्क प्रदान कर रहे हैं ऐसा और कहीं देखने को नहीं मिलता है।लोकगायन में उज्जैन शहर के आस-पास के गांवों से भी प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण प्राप्त करने आ रहे हैं। इस विधा में शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए प्रशिक्षणार्थी भी सम्मिलित हुए हैं। प्रशिक्षणार्थियों का कहना है कि लोकगायन सीधे हृदय को जोड़ता है तथा भाव प्रधान है।अकादमी के निदेशक डॉ. गोविन्द गन्धे ने कहा कि विगत कई वर्षों से ग्रीष्म कालीन शिविर खण्डित हो गया था जिसे गत वर्ष से पुनः प्रारम्भ किया गया। गतवर्ष कला में रूचि रखने वाले लोगों का उत्साह और प्रतिक्रिया को देखकर इस वर्ष पुनः शिविर आयोजित किया गया है जिसमें उत्साहजनक परिणाम मिल रहे हैं। लगभग 150 प्रशिक्षणार्थी अकादमी के इस शिविर में निःशुल्क प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। यहां प्रशिक्षण देने वाले प्रशिक्षक उच्चश्रेणी के अपने-अपने क्षेत्र के कलाकार हैं जो अत्यन्त तन्मयता के साथ यहां पर प्रशिक्षण दे रहे हैं। इस प्रशिक्षण शिविर की विशेषता यह है कि इसमें लोक भी है, शास्त्र भी है, गायन भी है, नृत्य भी है और व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाला कैलीग्राफी का प्रिशिक्षण भी दिया जा रहा है। इस शिविर में आयु का बंधन न होने से 10 वर्ष की आयु से लेकर 60 वर्ष के वृद्ध तक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। माँ-बेटी, सास-बहू, पिता-पुत्री सब एक साथ प्रशिक्षण ले रहे हैं यह दृश्य बहुत उत्साहजनक है।