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18 Apr 2026, Sat

जब बेटे को पिता से शर्म आने लगी

(पिता-पुत्र के रिश्ते पर आधारित एक हृदयस्पर्शी हिंदी कहानी)

रघुवीर सिंह पंवार

धूप तेज थी, मगर चेहरे पर उम्मीद की ठंडक थी। एक वृद्ध, थका-हारा, पसीने से भीगा आदमी शहर के बड़े ऑफिस की ओर बढ़ रहा था। उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था, और दिल में सालों की मेहनत से उपजा गर्व—क्योंकि आज वो अपने बेटे, एक बड़े अधिकारी, से मिलने आया था।

उसका नाम था शंकर लाल , जो कभी रिक्शा चलाता था, कभी माली का कम करता था , कभी दिहाड़ी करता—सिर्फ इसलिए कि उसका बेटा प्रमोद  पढ़-लिखकर एक दिन बड़ा आदमी बने।उसके बुढ़ापे का सहारा बने  आज प्रमोद  शहर का बड़ा अफसर है। पिता  उसी बेटे से मिलने पहली बार उसके ऑफिस पहुंचा।

गेट पर रुककर बोला,
“बेटा है मेरा, प्रमोद … उससे मिलना है।”

सुरक्षा गार्ड ने फोन किया। जवाब आया—
“बोल दो मीटिंग में हूं। और आगे से ऐसा कोई आए तो अंदर न आने देना।” मेरे पास समय नहीं हे |

शंकर लाल  बाहर बैठा रहा, तीन घंटे। फिर चुपचाप मिठाई का डिब्बा गार्ड को थमाया—
“कह देना, तुम्हारे पिता  आए थे  … मिठाई लाया था।”

शाम को थके कदमों से वापस चल पड़ा। बेटे ने  ऑफिस की खिड़की से  अपने पिता को जाते देखा, पर कुछ कह न सका।

अगले दिन खबर आई—
“रेलवे स्टेशन के पास एक वृद्ध की मौत, जेब में बेटे का पता और एक चिट्ठी मिली:
‘माफ कर देना बेटा… पहचानने की गलती की।’”

कहानी से सीख:

जो पिता अपने खून-पसीने से बेटे को ऊंचाई तक पहुंचाता है, उसे ही अगर बेटा दुनिया के डर से पहचानने से झिझके, तो यह समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है।

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