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20 Oct 2026, Tue

मध्य प्रदेश में युवा वोट पर सियासी फोकस: राहुल गांधी, नितिन नवीन और मोहन भागवत के कार्यक्रमों से बढ़ी राजनीतिक हलचल

मध्य प्रदेश में युवा वोट को लेकर राहुल गांधी नितिन नवीन और मोहन भागवत के कार्यक्रम

मध्य प्रदेश युवा वोट युवा वोट पर सियासी फोकस: राहुल गांधी, नितिन नवीन और मोहन भागवत क्यों सक्रिय?

भोपाल/इंदौर/उज्जैन। लेखक (रघुवीर सिंह पंवार ) मध्य प्रदेश में मध्य प्रदेश युवा वोट इन दिनों युवाओं को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सितंबर के तीसरे सप्ताह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और RSS प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रमों ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।

राहुल गांधी 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में युवाओं और छात्रों से संवाद करने वाले हैं। कांग्रेस के मुताबिक, कार्यक्रम के लिए डेढ़ लाख से अधिक रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। वहीं इससे पहले 17 सितंबर को भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन मध्य प्रदेश के दौरे पर रहेंगे। RSS प्रमुख मोहन भागवत भी 17 और 18 सितंबर को उज्जैन में रहेंगे और 18 सितंबर को ‘युवा धर्म संसद’ में युवाओं को संबोधित करेंगे।

एक ही सप्ताह में तीन बड़े चेहरों का मध्य प्रदेश में युवाओं पर फोकस कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे 2028 विधानसभा चुनाव की रणनीति भी है?

राहुल गांधी के कार्यक्रम से पहले नितिन नवीन और मोहन भागवत की सक्रियता क्यों?

राहुल गांधी का इंदौर कार्यक्रम पहले से प्रस्तावित था। कांग्रेस लंबे समय से इसकी तैयारियों में जुटी है। कार्यक्रम को लेकर आयोजन स्थल की अनुमति सहित कुछ विवाद भी सामने आए।

इसी बीच भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन का 17 सितंबर का मध्य प्रदेश दौरा सामने आया। भाजपा के मुताबिक उनका दौरा पार्टी के राष्ट्रव्यापी ‘सेवा संकल्प अभियान’ से जुड़ा है। यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर शुरू किया जा रहा है।

इस दौरान इंदौर में स्वामित्व योजना, मंदसौर में चीतों को छोड़ने और उज्जैन में 25 लाख दीयों के दीपोत्सव जैसे कार्यक्रमों की चर्चा है।

इसके साथ ही RSS प्रमुख मोहन भागवत का उज्जैन दौरा भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। भागवत 18 सितंबर को युवा धर्म संसद में युवाओं को संबोधित करेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में राहुल गांधी के कार्यक्रम के ठीक आसपास भाजपा और संघ के कार्यक्रमों का होना युवाओं के बीच राजनीतिक प्रभाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

युवाओं पर अचानक इतना राजनीतिक फोकस क्यों?

मध्य प्रदेश में युवा वोट युवाओं का मुद्दा नया नहीं है। लेकिन पिछले कुछ समय में देशभर में युवा आंदोलनों और रोजगार, परीक्षा तथा भर्ती से जुड़े मुद्दों ने राजनीतिक दलों को इस वर्ग की ओर और गंभीरता से देखने के लिए मजबूर किया है।

विश्लेषकों के मुताबिक, पहले राजनीतिक दल जातीय और सामाजिक समूहों के साथ-साथ महिला, आदिवासी और दलित वोट बैंक पर ज्यादा जोर देते थे। अब युवा वर्ग भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह के रूप में सामने आ रहा है।

मध्य प्रदेश में भी युवाओं से जुड़े मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं। व्यापम घोटाले से लेकर पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों में देरी जैसे मुद्दों ने युवाओं में असंतोष पैदा किया है।

यही वजह है कि राजनीतिक दल अब युवाओं के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

MP में युवा वोट की ताकत कितनी बड़ी है?

मध्य प्रदेश में युवा वोट 18 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 1.5 करोड़ मतदाता हैं। यह प्रदेश के कुल मतदाताओं का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा माना जाता है।

2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार, 18-19 वर्ष के करीब 16.89 लाख मतदाता थे। वहीं 18 से 23 वर्ष की उम्र के मतदाताओं की संख्या करीब 49 लाख थी।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि युवा मतदाता चुनावी राजनीति में कितना बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।

हालांकि, केवल युवा मतदाताओं की संख्या के आधार पर किसी पार्टी की जीत या हार का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। चुनाव परिणामों पर कई सामाजिक, राजनीतिक और स्थानीय मुद्दों का असर होता है।

2028 तक और बढ़ सकती है युवा मतदाताओं की भूमिका

.मध्य प्रदेश में युवा

मध्य प्रदेश में युवा वोट अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी को लेकर राजनीतिक दलों की गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं।

2027 में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं, जबकि 2028 में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए युवाओं से संपर्क बढ़ाना अभी से महत्वपूर्ण हो गया है।

नई उम्र के मतदाता लगातार मतदाता सूची में जुड़ रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले चुनावों में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या महत्वपूर्ण हो सकती है।

युवा वोट मतदाताओं को साधने के लिए राजनीतिक दलों को केवल बड़े कार्यक्रम करने से आगे बढ़कर रोजगार, शिक्षा और भर्ती जैसे वास्तविक मुद्दों पर जवाब देना होगा।

युवाओं के असली मुद्दे क्या हैं?

राजनीतिक मंचों पर युवा सबसे बड़ा मुद्दा बनते जा रहे हैं, लेकिन युवाओं की प्राथमिकताएं काफी व्यावहारिक हैं।

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सरकारी नौकरी और भर्ती

भोपाल में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए समय पर परीक्षा, पेपर लीक पर रोक और भर्ती प्रक्रिया पूरी होना सबसे बड़ी चिंता है।

युवाओं की मांग है कि परीक्षाएं पारदर्शी तरीके से हों और भर्ती प्रक्रिया लंबे समय तक अदालतों में न अटके।

बेहतर निजी रोजगार

इंदौर जैसे शहरों में बड़ी संख्या में युवा निजी कंपनियों में काम कर रहे हैं। लेकिन कम वेतन और बढ़ती महंगाई उनके सामने बड़ी चुनौती है।

युवाओं की प्राथमिकता सिर्फ शहर में अच्छी सड़क या बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि अच्छी सैलरी, करियर ग्रोथ और नौकरी की सुरक्षा भी है।

छोटे शहरों में रोजगार

छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं की समस्या कुछ अलग है। डिग्री हासिल करने के बाद उनके पास स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं होते।

नतीजतन उन्हें इंदौर, भोपाल या दूसरे राज्यों के बड़े शहरों की ओर जाना पड़ता है।

युवाओं की बड़ी मांग यह है कि उनके अपने जिले और शहरों में भी रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं।

क्या 2028 के चुनाव की तैयारी अभी से शुरू हो गई?

राजनीतिक गतिविधियों को देखें तो इसका जवाब काफी हद तक हां माना जा सकता है।

मध्य प्रदेश में 2027 के स्थानीय चुनावों को 2028 विधानसभा चुनाव से पहले की बड़ी राजनीतिक परीक्षा के तौर पर देखा जा सकता है। स्थानीय चुनावों में राजनीतिक दल यह समझने की कोशिश करेंगे कि अलग-अलग वर्गों में उनकी पकड़ कैसी है।

भाजपा संगठन स्तर पर अपनी तैयारी मजबूत कर रही है, जबकि कांग्रेस राहुल गांधी जैसे बड़े नेताओं के माध्यम से युवाओं और छात्रों से सीधा संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

RSS भी युवा संवाद के जरिए सामाजिक और वैचारिक स्तर पर अपनी पहुंच मजबूत करने में जुटा है।

राहुल गांधी बनाम भाजपा-संघ की रणनीति?

राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम सीधे छात्रों और युवाओं को केंद्र में रखता है। कांग्रेस के लिए यह युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का मौका है।

दूसरी ओर भाजपा के कार्यक्रमों में संगठन, सेवा अभियान और सामाजिक गतिविधियों के साथ युवा संवाद को जोड़ा जा रहा है। मोहन भागवत का युवा धर्म संसद में संबोधन इस रणनीति को वैचारिक आयाम भी देता है।

इसलिए 17 से 19 सितंबर के बीच होने वाले कार्यक्रमों को केवल अलग-अलग नेताओं के दौरे के रूप में देखना अधूरा होगा। इनके जरिए राजनीतिक दल युवाओं के बीच अपनी मौजूदगी और संदेश दोनों मजबूत करना चाहते हैं।

निष्कर्ष: युवा वोट बनेगा 2028 की बड़ी चुनौती

मध्य प्रदेश में युवाओं की बड़ी आबादी आने वाले चुनावों में राजनीतिक दलों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। लेकिन केवल बड़े आयोजन और भाषण युवाओं को लंबे समय तक प्रभावित नहीं कर सकते।

रोजगार, सरकारी भर्ती, पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, निजी क्षेत्र में बेहतर वेतन, स्थानीय रोजगार और करियर के अवसर जैसे मुद्दे युवाओं की वास्तविक प्राथमिकताएं हैं।

इसलिए राहुल गांधी का छात्र कार्यक्रम, नितिन नवीन का मध्य प्रदेश दौरा और मोहन भागवत का युवा धर्म संसद कार्यक्रम भले ही अलग-अलग आयोजनों का हिस्सा हों, लेकिन इनके बीच एक साझा राजनीतिक संदेश साफ दिखाई देता है—मध्य प्रदेश का युवा अब राजनीति के केंद्र में है।

आने वाले स्थानीय चुनाव और फिर 2028 विधानसभा चुनाव बताएंगे कि युवा मतदाता किस राजनीतिक दल के संदेश और वादों पर भरोसा करता है।

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